रवि बहुत ही बहादुर लड़का है। रवि को बचपन से ही खेलने कूदने का बहुत शौक था, उसे अपना कैरियर खेल मे ही बनना था। स्कूल के साथ-साथ उसने एकेडमी भी जॉइन कर रखी थी।
रवि के माता-पिता भी चाहते थे कि उनका बेटा खेल में आगे जाए और उनका नाम रोशन करें।
रवि को फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था और उसने एकेडमी भी फुटबॉल की ही जॉइन कर रखी थी। फुटबॉल के प्रति रवि में अलग ही जज्बा दिखाई देता था।
रवि के माता-पिता भी उसे बहुत प्रोत्साहित करते थे। और कभी पढ़ाई के लिए उसके ऊपर कोई दबाव नहीं डाला था, क्योंकि उन्हें दिख रहा था कि उनके बेटे में पढ़ाई से ज्यादा फुटबॉल का जज्बा है।
खेल के प्रति जुनून
रवि में फुटबॉल के प्रति जो जज्बा था उसे उसने बहुत बार साबित भी किया है। स्कूल के टूर्नामेंट में और बहुत सी जगह स्कूल के द्वारा लेकर जाने वाले टूर्नामेंट मे रवि ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है।
हर बच्ची में ही ऐसा खेल के प्रति जज्बा नहीं होता है। यह तो खैर मानते ही है कि, हर बच्चा एक जैसा नहीं होता सबकी अलग-अलग इच्छाएं होती है।
हर बच्चे की माता पिता भी रवि के माता-पिता जैसे नहीं होते हैं, क्योंकि वह अपने बच्चों को अपनी तरह ही रखना चाहते हैं। और उनकी इच्छाओं को देखते ही नहीं है और अपनी मन मर्जी से बच्चों पर पढ़ाई का बोझ डालते हैं।
जिस वजह से बच्चा ना तो अपनी पढ़ाई कर पता है और ना ही अपनी एक्स्ट्रा एक्टिविटीज पर ध्यान दे पता है। रवि की मम्मी पापा ने तो उसकी इच्छाओं का पूरा ध्यान रखा है और उसके टैलेंट को भी देखा है।
रवि के 18वें जन्मदिन पर उसके माता-पिता ने एक अच्छी कंपनी की फुटबॉल लाकर दी है। जिसे देखकर रवि बहुत खुश होता है क्योंकि उसके लिए फुटबॉल ही सब कुछ है। इस चीज से यह भी पता चलता है कि उसके माता-पिता चाहते हैं कि उनका बेटा बहुत आगे बढ़े।
टीम सिलेक्शन
रवि को चेन्नई फुटबॉल टीम मे सिलेक्शन चाहिए था। उसने सिलेक्शन के लिए दिन रात मेहनत करी है। वह सुबह जल्दी उठकर दौड़ लगाता, एक्सरसाइज करता। रवि के माता-पिता तो जब उड़ाते थे तब उन्हें रवि योग करता हुआ दिखाई देता था ।
रवि की माता-पिता उसे बहुत इनकरेज करते हैं। वह कहते हैं ना की सफल होने के लिए किसी का तो साथ चाहिए होता है। तो रवि के पास उसके माता-पिता का साथ था, लेकिन ऐसा अनिवार्य नहीं है कि हर किसी के पास प्रोत्साहित करने के लिए कोई न कोई हो।
चेन्नई फुटबॉल टीम सिलेक्शन के लिए रवि के पूरे मेडिकल टेस्ट हो चुके थे। और उसका फुटबॉल टेस्ट भी देख लिया था। वैसे तो रवि के पास बहुत से मेडल थे लेकिन फुटबॉल कमेटी को तो अपना पूरा काम ऑफीशियली करना ही है, ताकि आगे जाकर कोई दिक्कत उन पर ना आए।
रवि के सारे टेस्ट सफल होते हैं और वह बहुत खुश होकर अपने घर आता है। और पूरी सिलेक्शन की बात अपने माता-पिता को बताता है, उन्हें कहता है कि अब सिर्फ नाम की लिस्ट आनी बाकी है।
रवि के माता-पिता यह सुनकर बहुत खुश हो जाते हैं। लेकिन कहते हैं ना कि अच्छे काम को किसी की नजर लग ही जाती है, तो रवि के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
खुशी ही खुशी में रवि घर से अपने दोस्तों के साथ निकल जाता है और उन्हें एक पार्टी ट्रीट देने के लिए जाता है। अचानक रवि की बाइक के सामने से एक बिल्ली गुजरती है। और रवि उस बिल्ली को बचाने के लिए अपनी बाइक को दूसरी दिशा में घूमता है, और पत्थर से टकराकर रवि गिर जाता है।
टकराने के बाद रवि का पर बाइक के नीचे आ जाता है। उसमें उसकी एक पैर की हड्डी टूट जाती है। रवि को डॉक्टर के पास ले जाया जाता है, और डॉक्टर उसे कोई भी फिजिकल एक्टिविटी करने से मना कर देता है।
यह सुनकर रवि बिल्कुल टूट जाता है और सारा दिन गुमसुम होकर बैठा रहता है, फिर सोचता है कि अभी तो मेरा सिलेक्शन हुआ ही था और मेरे साथ इतनी बड़ी घटना हो गई। रवि के माता-पिता उसका मनोबल टूटने नहीं देते हैं।
लेकिन रवि के लिए तो फुटबॉल ही सब कुछ था तो रवि कैसे ना टूटता। रवि का सपना पूरी तरह टूट चुका था, और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करेगा। फिर थोड़े दिन बाद रवि अपने पापा के बिजनेस में लग जाता है क्योंकि अब फुटबोल को लेकर ही तो वह बैठा नहीं रह सकता था।
रवि के माता-पिता को भी अच्छा लगता है कि अब उनका बेटा आगे बढ़ रहा है।
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