लोगों का तो काम है कहना बातें बनाना । अगर सुनिधि भी लोगों की बातें सुनकर अपने करियर पर फोकस ना करती तो आज और लड़कियों की तरह सुनिधि की भी शादी जल्द ही हो गई होती।
सुनिधि को अपने भविष्य की बहुत चिंता थी। और वह अपने भविष्य को लेकर किसी भी तरह का कंप्रोमाइज नहीं कर सकती थी। और लोगों की बातों पर तो बिल्कुल ध्यान नहीं देती थी। चाहे लोग उसके बारे में कुछ भी कहे, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो लोगों की बातों को दिल से नहीं लगाती थी।
जिंदगी का मकसद
सुनिधि अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहती थी। सुनिधि को बैडमिंटन खेलने का बचपन से ही शौक था, और अपने दोस्तों के साथ फ्री टाइम में भी वह बैडमिंटन ही खेलती थी। बैडमिंटन में उसे अपना उज्जवल भविष्य दिखाई देता था।
पढ़ाई में सुनिधि की इतनी कोई खास रुचि नहीं थी। लेकिन सुनिधि के माता-पिता को उसका बैडमिंटन खेलना पसंद नहीं था, क्योंकि वह एक ऐसी जगह से थे जहां लोग लड़कियों और लड़कों में भेदभाव करते थे।
उनका यह मानना था की लड़कियों को सबसे पहले घर के कामकाज सिखाना जरूरी है। क्योंकि उन्हें शादी करके ससुराल जाना है, और वहां जाकर अपनी जिम्मेदारी उठानी है।
लेकिन इन सब बातों पर सुनिधि बिल्कुल ध्यान नहीं देती थी। क्योंकि उसे पता था कि लोगों की सोच बहुत छोटी है। और वह आज के जमाने की लड़की है जिसमें लड़कियों को हर एक फील्ड में बराबर का हिस्सा मिलता है।
सुनिधि को पता था कि उसके माता-पिता को भी उसका बैडमिंटन खेलना पसंद नहीं है। लेकिन कहीं ना कहीं उसे यह उम्मीद थी कि उसके माता-पिता तो उसका साथ देंगे और लोगों की बातों पर ध्यान न देकर उसे हौसला देंगे।
सुनिधि का यह सोचना तो ठीक था क्योंकि कोई भी मां-बाप अपने बच्चे की खुशी के खिलाफ नही जाते है। और अंत मे साथ तो अपने बच्चे का ही देते है, इसलिए सुनिधि को अपने मां-बाप की तरफ से कोई चिंता नहीं थी।
धोखेबाज दोस्त
सुनिधि की एक बहुत अच्छी दोस्त थी जिसे सुनिधि अपने जीवन की हर एक बात शेयर करती थी। सुनिधि को अपनी उस दोस्त पर बहुत भरोसा था। जब भी सुनिधि को कहीं जाना होता था तो वह अपनी दोस्त के साथ ही जाती थी । और उसकी दोस्त भी सुनिधि के घर आती जाती रहती थी।
लेकिन कहते हैं ना कि हर एक दोस्त सच्चा नहीं होता है और साथ देने वाला नहीं होता है। दोस्तों को भी कभी अपनी कामयाबी से जलन होती ही है। ऐसा ही कुछ सुनिधि के साथ भी हुआ।
सुनिधि की दोस्त को सुनिधि की कामयाबी से बहुत जलन हो रही थी, क्योंकि सुनिधि को बैडमिंटन में कहीं मेडल मिले हुए थे। तो उसकी दोस्त को यह लगता था कि यह तो अपने करियर में बहुत आगे बढ़ रही है।
जब एक दिन सुनिधि अपनी बैडमिंटन प्रैक्टिस कर रही थी, तो उसका दोस्त भी उसी के साथ थी। अब उसकी दोस्त सुनिधि के साथ कुछ गलत करने का सोच रही थी, जिससे सुनिधि कभी बैडमिंटन ही ना खेल सके।
सुनिधि की दोस्त सुनिधि को पीछे से जाकर धक्का मार देती है और सुनिधि का एक हाथ फ्रैक्चर हो जाता है। जिससे अब सुनिधि 1 साल तक बैडमिंटन भी नहीं खेल सकती थी, क्योंकि उसे डॉक्टर ने साफ मना कर दिया था।
सुनिधि को पता था कि उसकी दोस्त ने यह जानबूझकर किया है। उसकी दोस्त तो ऐसे कर रही थी जैसे कि सुनिधि को गलती से धक्का लगा हो। सुनिधि ने अपनी उस दोस्त से बात करना बंद कर दिया था, क्योंकि सुनिधि को अपनी जिंदगी में ऐसा कोई दोस्त नहीं चाहिए था जो की अपने दोस्त की कामयाबी से ही जेल।
सुनिधि जब अपने कमरे में अकेली बैठी होती है, तो सोचती है कि उसने लोगों की बातों पर तो ध्यान नहीं दिया था, और बैडमिंटन के सपने को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रही थी। लेकिन उसकी दोस्त ने ही उसके साथ गलत कर दिया।
कहते हैं कि हम लोगों की बातों को तो सह सकते हैं। लेकिन जब कोई अपना दोस्त ही गलत करता है, तो बहुत बुरा लगता है ऐसा ही कुछ सुनिधि के साथ भी हुआ।
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